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Thursday, May 6, 2021
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जानें क्यों और कैसे मनाते हैं बैसाखी, किन-किन धर्मों से है संबंध

बैसाखी का पर्व देश भर में 13 अप्रैल को मनाया जा रहा है। इस पर्व को भारतीय नववर्ष की शुरुआत के रूप में भी जानाजाता है। वैसे भी इस वर्ष बैसाखी का पर्व खास है। क्योंकि इसी दिन नवरात्र भी शुरू हो रहा है। बैसाखी के दिन ही अन्न की पूजा की जाती है। यह पर्व खास इसलिए भी है क्योंकि इसी खालसा पंथ की स्थापना भी हुई थी। इसलिए यह सिख धर्म में खास है। सिख धर्म के साथ-साथ यह पर्व हिंदू और बौद्ध धर्म में भी खास है। क्योंकि बैसाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।

किसानों के लिए खास है बैसाखी

बैसाखी का पर्व किसानों के लिख खास है। क्योंकि बैसाखी के ही दिन रबी की फसल कट कर घर आती है। गेहूं, जौ, चना, मटर आदि फसलें कट कर घर आती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो किसानों के पसीने सिंचित उसकी कमाई घर आती है। इस खुशी में किसान उल्लासित हो कर नाचता है। अन्न की पूजा कर प्रकृति के प्रति आनी कृतज्ञता व्यक्त करता है। पंजाब में तो बैसाखी दिन मेला लगता है। किसान भंगड़ा डालते हैं और जलेबियां खातें हैं। हलांकि कोरोना के कारण इस बार बैसाखी के न तो मेले लग रहे हैं और ना ही सार्वजनिक उत्सव मनाया जा रहा है।

अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है बैसाखी

बैसाखी का पर्व न केवल पंजाब में बल्कि देश के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। बंगाल में इसे नबा वर्षा तो असम में बिहू और केरल में पूरम विशु के नाम से लोग मनाते हैं। यानी वेशक इस पर्व का नाम अलग-अलग है, लेकिन भावनाएं एक हैं । वह है पकृति के प्रति आभार जताना।

बैसाखी को हुई थी खालसा पंथ की स्थापन

बैसाखी का दिन सिख धर्म में काफी मायने रखता है। क्योंकि इसी दिन 13 अप्रैल 1699 को सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। बैसाखी के दिन से ही पंजाबी नव वर्ष की शुरुआत भी होती है। इसी दिन दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरुओं की वंश परंपरा को समाप्त कर श्री गुरु ग्रंथ साहिब को जीवित गुरु सर्वोच्च स्थान दिया। इसके बाद सिख धर्म के अनुयायी श्रीगुरु ग्रंथ साहिब को अपना पथप्रदर्शक बनाया। मान्यता है कि बैसाखी के दिन ही श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अलग-अलग जातियों के पांच लोगों को अमृत छका कर सिख बनाया और उन्हें सिंह नाम दिया। इसके बाद से सिख धर्म के लोगों ने अपना सरनेम सिंह यानी शेर को स्वीकार किया। आग चल कर यही पांच लोग पंज प्यारे के नाम से जाने जाने लगे। मान्यता है कि यह उपाधि श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम से आया।

विशाखा से नाम पड़ा बैसाखी

कई लोग पूछते हैं कि बैसाखी नाम क्यों और कैसे पड़ा। इस प्रश्न के उत्तर में श्री आत्म प्रकाश शास्त्री कहते हैं कि सनातन धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों को पता होगा कि 15 नक्षत्रों में विशाखा नक्षत्र भी होती है। इसे त्रिपाद नक्षत्र भी होता है। क्योंकि इस तीनों चरण तुला राशि में होते हैं। और चौथा चरण वृश्चिक राशि में होता है। बैसाखी के समय विशाखा नक्षत्र होती है। विशाखा पूर्णिमा में होने के कारण इसे बैसाखी कहा जाता है। बैसाख माह के नाम से ही इसका नाम बैसाख बड़ा। आत्म पकाश के अनुसार वैशाख माह के पहले दिन को बैसाखी कहा गया है। क्योंकि इसी दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है।

गंगा अवतरण दिवस के रूप में भी मनाई जाती है बैसाखी

कहा जाता है कि बैसाख की मेष संक्रांति के दिन ही पतितपावनी गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इस दिन हिंदू धर्म में विश्वास रखने वाले लोग गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं।

13 अप्रैल को ही क्यों मनाई जाती है बैसाखी

अब सवाल यह उठता है कि हर वर्ष बैसाखी 13 अप्रैल को ही क्यों मनाई जाती है। इस सवाल का भी जवाब स्वामी आत्म प्रकाश शास्त्री देते हैं। वे कहते हैं कि सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है तो बैसाखी मनाई जाती है। हर साल सूर्य 13 या 14 अप्रैल को मेष राशि में प्रवेश करता है। वे कहते हैं कि सूर्य की इस स्थीति परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव आता हैं। सूर्य की उष्मा में तेजी आती है। और गर्मी के कारण रबि की फसल भी पक जाती है। मौसम के प्राकृतिक बदलाव के कारण भी इसे त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

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