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Tuesday, April 13, 2021
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कभी सैदपुर के चटख रंगों से रंगीन होती थी होली, आज “बे रंग” है रंगों का शहर

पुड़िया वाला नील भी बनता था सैदपुर में

लोगों के अनुसार कुटीर उद्योग के रूप में मान्यता मिलने के साथ ही कई महिला और पुरुषों को रोजगार मिले इसके साथ ही सहित वर्णों का दायरा बढ़ने लगा रंगो के बढ़ते दायरे के साथी सैदपुर के मलेरिया टोला पश्चिम बाजार मनगढ़ सहित कई मोहल्लों में रंग उद्योग पुष्पित और पल्लवित होने लगा यही नहीं यहां पुड़िया वाला नील भी बनने लगा, जिसकी जबरदस्त मांग थी।

रंगों से लाल हो उठता था गंगा घाट

लोग कहते हैं कि एक जमाना था जब बंबई रंग एजेंसी में काम करने वाले मजदूर लंच ब्रेक के समय दोपहर में गंगा स्नान करने जाते थे तो वहां स्नान के दौरान गंगा के विभिन्न घाटों का पानी कई किलोमीटर तक रंगीन हो जाता था। लेकिन बदलते समय के साथ सिंथेटिक रंगों ने कृत्रिम रंगों का स्थान ले लिया, जिसकी वजह से सैदपुर का रंग उद्योग आज मरणासन्न स्थिति में अपना दिन गिन रहा है। हालांकि रंगों का पर्व होली के नजदीक आते ही यहां का बे रंग हो चुका रंग उद्योग एक बार फिर से अपने रंगीन छटा बिखेरने लगता है।

रंग उद्यमियों को मलाल, सरकार नहीं दे रही प्रोत्साहन

दम तोड़ते सैदपुर के रंग उद्योग में प्राण फूंकने की कोशिश कर रहे यहां के रंग कारोबारियों का कहना है कि सरकार रंग उद्योग को प्रोत्साहित नहीं कर रही है। उनका कहना है कि रंग उद्योग का बंद होना ही यहां के श्रमिकों के पलायन का एक बार आप बड़ा कारण है। उद्यमियों का कहना है कि संसाधनों और प्रोत्साहन के अभाव में करीब 60 सालों तक अपनी छटा बिखेरने वाला रंग उद्योग अब दम तोड़ने की कगार पर आ गया है। उद्यमियों का कहना है कि किसी जमाने में इत्र के रूप में अपनी पहचान बना चुके गाजीपुर और रंगों के लिए जाना जाने वाला सैदपुर अब अपनी पहचान खोता जा रहा है। सरकार को चाहिए कि रंग उद्योग को जीवित करने के लिए कोई आवश्यक कदम उठाए ।

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