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Tuesday, April 13, 2021
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आप ने हमें तंग किया पर हमने कभी किसी को गम नहीं दिया

सांता क्लाज के मुस्कारते चहरे को देख बच्चे तो क्या बच्चों के माता-पिता भी उनसे हाथ मिलाते और सेल्फि लेते हैं व बड़े चाव से फोटो भी खिंचवाते हैं। यही नहीं कुछ सांता के साथ हंसी मजाक करने की आड़ में उन्हें परेशान भी करते हैं, लेकिन क्या कभी किसी नें ‘सांता’ के मुस्कुराते चेहरे के पीछे छिपे दर्द या उसकी मजबूरी को जानने की कोशीश की है, जिसकी वजह से किसी गिफ्ट कॉनर्र या फिर शॉपिंग सेंटर के दरवाजे पर 10 से 12 घंटे खड़े हो कर वह हाथ मिलाता है।

सबकी अपनी मजबूरियां होती हैं साहब

गुरु नगरी अमृतसर के क्रिटल चौक पर स्थित एक गिफ्ट कॉर्नर के बाहर खड़े सांता क्लाज दुकान में आने वाले ग्राहकों का आगे बढ कर अभिवादन करता है और बच्चों से हाथ मिलाता है, फिर उन्हें टॉफियां देता है। सांता क्लाज बने युवक का यही क्रम सुबह दस बजे रात के 9 से 10 बजे तक चलता रहता है। इस दौरान वह न तो किसी से बात कर पता है और ना ही वह कहीं बैठ सकता है। बता दें कि इस वक्त कोरोना की वजह से नाइट कर्फ्यू होने के कारण सांता को 9-10 बजे तक ही खड़ा रहना पड़ रहा है। नहीं तो रात के 11 से 12 बज जाते थे।

यानी दिन के दस से 11 घंटे उसे इसी तरह बिताने पड़ते हैं। बच्चों की छेड़छाड़ अलग से सहनी पड़ती है।

सांता क्लज बने बिहार के दरभंगा निवासी असलम बताते हैं। वह काम की तलाश में करीब तीन साल पहले पंजाब के अमृतसर आए थे। यहां वह दिहाड़ीदार मजदूर हैं। कोविड-19 की वजह से कभी काम मिलता है, तो कभी नहीं मिलता। असलम ने बताया कि उनका एक दोस्त दुकान पर काम करता है। उसने उन्हें सांता बनने का काम दिला दिया। यह काम छह सात दिनों का है। पांच छह सौ रुपये दिहाड़ी मिल जाती है। बेरोजगारी से तो अच्छा ही है कम से कम एक हफ्ते तक तो रोजगार मिल ही गया है। बाद की बाद में देखेंगे।

फोन भी नहीं उठा सकता ‘सांता’

लॉरेंस रोड स्थित एक शॉपिंग सेंटर के बाहर खड़ा सांता बच्चों से हाथ मिला रहा था। कुछ और लोग भी आए हाथ मिलाए सांता के मुस्कुराते चेहरे के साथ फोटो खिंचवाया और हैप्पी क्रिसमस बोल कर चले गए। यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। इस दौरान उसके जेब में पड़े फोन की घंटी बज उठी। सांता को समझ नहीं आ रहा था कि वह फोन उठाए या शॅापिंग सेंटर में आने वालों का अभिवादन करे। किसी तरह उसने फोन उठाया सांता का मुखौटा उतार और हैलो…बोला। युवक का चेहरा कुछ देर के लिए भाव शुन्य हो गया।

पल भर रुकने बाद बोला घर पर आ कर बात करते है। उस समय रात के दस बज रहे थे। पूछने पर उसने बताया कि वह उसका नाम राजू है। वह उत्तर प्रदेश के गोंडा का है। किसी मिल में काम करता था। कोरोना की वजह से नौकरी चली गई। बच्चे साथ रहते हैं। अब वह दिहाड़ी कर रहा है। उसे यहां सांता बनने के रोज के सात सौ रुपये मिलते हैं। हप्ता दस दिन का काम है सोचा कर लूं। पत्नी का फोन था, बच्ची को हल्का बुखार है। अब यहां फोन पर ज्यादा बात भी नहीं कर सकता। अब घर जा कर ही देंखेंगे।

बच्चे बहुत तंग करते हैं

यह मुस्कुराता हुआ चेहरा सांता का क्लाज का है। अपनी इसी मुस्कुराहट की वजह से क्यूट बेबी सा दिखने वाला सांता अपने सीने में जमाने का दर्द छिपाए लोगों के चहरे पर क्षणभर के लिए मुस्कराहट ला देता है। लेकिन अपनी इसी मासुमियत भरी मुस्कान वाले मुखौटे के पीछे छिपे सांता बने व्यक्ति को कोई बार असहज स्थितियों का सामना करना पड़ता है। कई बार बच्चे सांता को चुटकी भी काट लेते हैं, लेकिन, बेचारा सांता तो सांता ही है, अपना दर्द भी किसी को बयां नहीं कर पाता।

रंजीत एवेन्यू स्थित एक शो रूम के बाहर सांता बने वरियाम सिंह अमृतसर के सीमावर्ती गांव के रहने वाले हैं। वे कहते हैं कि उन्हें सांता बनने के रोज के छह सौ रुपये मिलते हैं। वह गांव में इस वक्त बेले थे। उनका पड़ोसी यही एक शो रूम में काम करता है। उसी ने उन्हें यह काम दिलवाया। यहां दस से 12 घंटे खड़े रहने पड़ते हैं। कभी-कभी बच्चे तो कभी बड़े भी शरारत कर देते हैं। वह कहते है बाबू जी क्या करूं, दर्द सहते हुए भी लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट तो लानी ही पड़ती है। क्योंकि सांता जो बना हूं।

आप ने हमें तंग किया पर हमने कभी किसी को गम नहीं दिया

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